वास्तु शास्त्र में ड्राइंग रूम को लेकर कोई विशेष चर्चा नहीं है। कुछ नौसिखिये वास्तुशास्त्रयों ने वायव्य कोण में ड्राइंग रूम बनाने का प्रस्ताव किया है जो कि प्राचीन वास्तु शास्त्रों की भावना के अनुरूप नहीं है। वराहमिहिर के अनुसार वायव्य कोण में धान्यागार अर्थात अन्न भण्डारण की व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी और पश्चिम दिशा मघ्य से वायव्य कोण पर्यन्त रोदन कक्ष हुआ करता था। अन्न भण्डारण वायव्य कोण में होने का अर्थ उच्चाटन की प्रकृति होने के कारण अधिक अन्न का खर्च होना माना गया है। प्राचीन भारतीय वैदिक ऋषि यह मानते थे, जिस घर में अधिक अन्न खर्च होगा वह घर अधिक मेहमान आने के कारण शीघ्र उन्नति को होगा। अर्थात जिस घर में वर्ष में 2 बोरी गेहूं खर्च होता है, वायव्य में भण्डारण के कारण 3 बोरी खर्च हो जाएगा। आधुनिक महिलाएं चाहती हैं कि आधा बोरी अन्न भी खर्च न हों। मेहमान कम आवें और आवें तो खाने के लिए उन्हें ढाबे में ले जाया जाए। मनोवृत्ति में अब अंतर आ गया है और आगंतुक के प्रति शिष्टाचार के नियम भी बदल गए हैं। उधर ड्राइंग रूम यदि रोदन कक्ष के लिए प्रस्तावित स्थान में आ गया तो घर की महिलाओं या कुंठित व्यक्तियों के लिए नैराश्य भावनाओं के निष्क्रमण का स्थान भी नहीं रहता है। प्राचीन शास्त्रों के इस प्रस्ताव का पालन किया जाए कि रोदन कक्ष के स्थान पर प्रतिदिन भी यदि एक घंटा से अधिक वे लोग समय बिताएं जो कि समूह के रूप में रहते हैं या जिस घर में कुंठाएं अधिक है तो इस स्थान पर अश्रुपात को प्रेरणा मिलेगी और çस्त्रयों के मनोमस्तिष्क में बनी हुई काल्पनिक ग्रंथियों के उन्मूलन में भी मदद मिलेगी।
आज अस्पतालों के मनोवैज्ञानिक कक्ष या न्यूरोलोजी विभाग भरे रहते हैं और सार्वजनिक जीवन में कुंठाग्रस्त या अवसाद से पीडित लोग जिन दवाईयों का आश्रम लेते हैं वे अधिकतर नींद लाने वाली होती है, जिनके लेने के थोडे दिन बाद ही व्यक्ति इन दवाओं का एडिक्ट भी हो जाता है। यदि वायव्य कोण में हम ड्राइंग रूम बनाएंगे तो रोदन कक्ष और धान्यागार का स्थान छिन जाएगा और घर में रोग निवारण के लिए शास्त्रोक्त रीति से उपलब्ध कराए गए स्थान से हम वंचित रह जाएंगे। दूसरे यह भारतीय संस्कृति के विपरीत है कि हम गैस्ट रूम उस जगह बनाएं जहां मेहमान 3 दिन की बजाय एक दिन में ही वापस चला जाए। अबोध कन्याओं के लिए भी यह शयन कक्ष उचित स्थान नहीं है क्योंकि उच्चाटन प्रकृति होने के कारण इस स्थान पर सोने वाली कन्याएं मानसिक रूप से जल्दी परिपक्व हो जाएंगी और विवाह पूर्व ही उनका घर से मन उचट जाएगा। यह परिवार के लिए समस्या खडी कर सकता है। अत: वायव्य कोण में ड्राइंग रूम या गैस्ट रूम का प्रस्ताव कोई बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं है, क्योंकि यह शास्त्रीय धारणाओं के विपरीत है और यहां ड्राइंग रूम या गैस्ट रूम होने के कारण आगंतुक मेहमान मेजबान से दिलो-दिमाग से जुड नहीं पाएगा एवं विपरीत धारणाएं लेकर वापस जाएगा। स्वागत कक्ष का प्रस्ताव ईशान कोण में होना बताया गया है। बृहत्संहिता के अनुसार ईशान कोण में औषधि, देवगृह और सर्वधाम के स्थान आते हैं। स्वभावत: देवगृह में यदि देवता का भी स्थान हो तो आगंतुक उस स्थान पर संकोच सहित और सम्मानसहित जाएगा। पुनश्च: उस स्थान पर यदि शयन करेगा तो वहां कोमल और आघ्यात्मिक भावनाएं ही प्रधान रहेंगी और आगंतुक मेहमान मनोवैज्ञानिक दृष्टि से निर्मलचित्त रहने के कारण मेजबान के प्रति विपरीत धारणाएं नहीं बना पाएगा। वह स्थान देव स्थान होने के कारण मेजबान परिवार में भी मेहमान के प्रति देवतुल्य धारणाएं रहेंगी और अतिथि को देव ही समझा जाएगा। अत: यह स्थान ड्राइंग रूम या गैस्ट रूम के लिए अधिक प्रशस्त है।
पुराने राजा-महाराजा दीवाने आम व दीवाने खास बनवाते थे। दीवाने आम में वे सब व्यक्तियो से मिलते थे और दीवाने खास में वे कुछ महžवपूर्ण व्यक्तियों से मिलते थे। आधुनिक स्थापतियों ने एक ऑर्डिनरी डाईन और एक फाईन डाईन (उच्चाकोटि के भोजन का विशेष स्थान) का प्रस्ताव किया है। फाईन डाईन में ड्रिंक्स का प्रयोग या विशेष भोजन या विशेष अतिथियों का आगमन शामिल किया है, परंतु यह स्थान ड्राइंग रूम का स्थान नहीं ले सकता। अधिकांश मेहमान ऎसे आते हैं जो चाय पीकर ही वापस चले जाते हैं। अत: ड्राइंग रूम का स्थान डाईनिंग रूम से अलग रखा जाना ही उचित है। कुछ आधुनिक आर्किटेक्ट दो ड्राइंग रूम की व्यवस्था रखने लगे हैं। जो मेहमान साधारण रूप से आएं और कुछ समय व्यतीत करके चले जाएं उनके लिए ईशान कोण का ड्राइंग रूम उत्तम रहता है। परंतु जो लोग परिवार के अंतरंग मित्र हों और स्त्री-बच्चों सहित आएं, उनके लिए नैऋत्य कोण में वह स्थान दिया जा सकता है जिसे कि वराहमिहिर ने शस्त्रागार बताया है। लगभग सभी प्राचीन शास्त्रकारों ने गृहस्वामी के लिए शयनकक्ष दक्षिण दिशा में ही प्रस्तावित किया है न कि दक्षिण-पश्चिम में। आजकल के कुछ वास्तु शास्त्रयों ने नैऋत्य कोण में मास्टर बैडरूम प्रस्तावित किया है। यह स्थान दक्षिण के शयनकक्ष की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली नहीं होता। अत: हम नैऋत्य कोण में सामान्यतौर से खास पारिवारिक मित्रों के लिए ड्राइंग रूम बना सकते हैं, साथ ही उसे इस भांति भी तैयार कर सकते हैं कि जब उस घर में मेहमान नहीं हो तो टी.वी. रूम या लीविंग रूम या सम्मिलित रूप से बैठकर वहां कुछ गतिविधियां की जा सके। इसके दो लाभ होंगे, जिन छोटे पुत्र-पुत्रियों को किसी कारण से भवन में उचित स्थान न मिल सके उन्हें यदि नैऋत्य के गैस्ट रूम या लीविंग रूम में दो घंटे भी बिताने को मिल जाएं तो उनके व्यक्तिगत गुणों में वृद्धि और स्वभाव में गांभीर्य आने लगेगा। अप्रत्यक्ष रूप से एक लाभ होगा कि नैऋत्य कोण में बैठने पर वहां मन लगने लगता है। ऎसा तभी संभव है जब घर के सभी सदस्यों के बीच में स्नेह, सद्भाव और सामंजस्य हो। अत: घर में एकता बढाने के लिए यह स्थान बहुत अच्छा है। परंतु ऎसा तभी संभव है जब भूखंड का क्षेत्रफल 300 गज या अधिक हो अन्यथा दो ड्राइंग रूम के स्थान निकालना अत्यंत कठिन काम है।
आजकल आर्किटेक्ट प्लॉट के मघ्य में ओपन लाउंज की व्यवस्था करके उसमें डाईनिंग टेबल तथा सोफा रखने की जगह निकाल देते हैं तथा दोनों के बीच में विभाजक दीवार या पर्दे के माघ्यम से दोनों को अलग करने की चेष्टा करते हैं। इससे भवन की प्राईवेसी समाप्त हो जाती है और लगभग हर व्यक्ति घर के अंदर तक झांकने में सफल हो जाता है। ड्राइंग रूम ऎसा होना चाहिए जिससे घर का एकांत भंग न हो। रसोई इतनी नजदीक हो कि ड्राइंग रूम तक चाय-पानी इत्यादि पिलाने में कठिनाई न हों। इस उद्देश्य से अग्निकोण में रसोई और पूर्व दिशा मघ्य में एक डाईनिंग टेबल की व्यवस्था रखते हुए यदि ईशान कोण मे ड्राइंग रूम की व्यवस्था कर ली जाए तो न केवल घर की सुविधा बढेगी बल्कि शास्त्रीय नियमों का पालन भी किसी हद तक हो सकेगा। जो भूखंड बहुत बडे हैं तथा जिसमें मुख्य भवन निर्माण के अतिरिक्त कई गुना अधिक भूमि बच जाती है उनमें ड्राइंग रूम हमेशा पश्चिम दिशा में ले जाना उचित रहता है क्योंकि ऎसे भूखंडों में दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम तो निर्मित क्षेत्रफल के कारण सुधर जाता है परंतु पश्चिम दिशा खाली रह जाती है। पश्चिम दिशा में ड्राइंग रूम का एक फायदा अवश्य होता है कि यहां बैठकर व्यक्ति भावनाओं को छिपा नहीं पाता है और वे अनायास ही अभिव्यक्त हो जाती हैं। ड्राइंग रूम मुख्य भवन के अनुपात में बहुत बडा नहीं होना चाहिए। बहुत बडे ड्राइंग रूम की व्यवस्था बहुत बडे खर्चे का कारण बनते हैं। अनुपात से बडा ड्राइंग घर के अंदर के प्राणियों में हीन भावना को जन्म देने लगता है। इसके विपरीत बहुत बडे निर्मित क्षेत्रफल के अनुपात से काफी छोटा ड्राइंग रूम भी हीन भावनाओं को जन्म देता है। यदि घर में पांच बैडरूम भी हों तो कम से कम 250 वर्गफुट में एक ड्राइंग रूम अवश्य ही बनाया जाना चाहिए।


















