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इश्क़ के खेल में मात अच्छी लगी

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आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दें यादें

ज़िंदगी बीत गई और वही यादें-यादे ।

हज़ार सूरतें आंखों में फिरती रहती हैं

मेरी निगाह में हर बार अब कहाँ तू भी ।

मैं दीवाना सही पर बात सुन ऐ हमनशीं मेरी

कि सबसे हाले-दिल कहता फिरूँ आदत नहीं मेरी ।

और कुछ भी मुझे दरकार नहीं है लेकिन

मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे ।

ख़्वाबों की अन्जुमन में हर एक शै हसीन थी

जागे तो अपने पांव के नीचे ज़मीन थी ।

पढ़ लिख गए तो हम भी कमाने निकल गए

घर लौटने में फिर तो ज़माने निकल गए  ।

सूखे गुलाब, सरसों के मुरझा गए हैं फूल

उनसे मिलने के सारे बहाने निकल गए ।

मुस्कराता फिर रहा है, देखना वो शाम तक

शहर की सारी उदासी अपने घर ले जायेगा ।

दिल गवां आए हम, जान भी हार दी

इश्क़ के खेल में मात अच्छी लगी  ।

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