खाली हाथों को कभी गौर से देखा है फराज
किस तरह लोग लकीरों से निकल जाते हैं ।
जाने वाले को न रोको कि भरम रह जाए
तुम पुकारो भी तो कब उसको ठहर जाना है ।
सिर्फ ये सोच कर तुमसे मुहब्बत करते हैं फराज
मेरा तो कोई नहीं, तुम्हारा तो कोई हुआ ।
वो जिस के पास रहता था दोस्तों का हुजूम
सुना है फराज, कल रात एहसास-ए- तनहाई में मरा ।
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें के जो
रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जायेंगे
जिस्म की मौत से ये भी मर जायेंगे
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब तो रौशनी हैं, नवा हैं, हवा हैं
जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं
ज़ुल्म के दोज़ख़ों से भी फुँकते नहीं
रौशनी और नवा और हवा के आलम
मक़्तलों में पहुँच कर भी झुकते नहीं
ख़्वाब तो हर्फ़ हैं
ख़्वाब तो नूर हैं
ख़्वाब तो सुक़्रात हैं
ख़्वाब मंसूर हैं
बेवफ़ा हो जायें
इस से पहले के बेवफ़ा हो जायें
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें
तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल क्या से क्या हो जायें
हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
और कहीं और मुब्तला हो जायें
इश्क़ भी खेल है नसीबों का
ख़ाक हो जायें किमिया हो जायें
अब के गर तू मिले तो हम तुझ से
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जायें
बन्दगी हम ने छोड़ दी है ‘फराज़’
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जायें


















