मैं राह में गिरा तो जैसे टूट कर बिखर गया
मिला जो तेरा हाथ तो वजूद ही सँवर गया
वो कह रहा था मुझसे कि हाँ देगा मुझपे जान भी
मगर मैं ऐतबार के ही नाम से सिहर गया
जो उसके रुख़ से गिर गया हिजाब मेरे सामने
मेरी नज़र से धुल के वो कुछ और भी निखर गया
सुना जो उसकी बज़्म में हुआ था तेरा ज़िक्र, मैं
हज़ार बार तेरा हाल जानने उधर गया
जो पूरी एक उम्र की बेचैनी उसके पास थी
वो जाते जाते अपनी पूंजी मेरे नाम कर गया
जो ज़र्रे को भी चल गया पता अब अपनी हस्ती का
वो उड़ के थोड़ी देर फिर ज़मीन पर उतर गया
महक रही है ज़िंदगी अभी भी जिसकी खुश्बु से
वो कौन था ऐ 'दोस्त' जो क़रीब से गुज़र गया


















