You are here: Home Most Popular Poetry/शायरी उनको डुबो गया जो उन्हीं का ग़रूर था - साग़र साहेब

cgspice.com

उनको डुबो गया जो उन्हीं का ग़रूर था - साग़र साहेब

E-mail Print
User Rating: / 0
PoorBest 

वो बस के मेरे दिल में भी नज़रों से दूर था
दुनिया का था क़ुसूर न उसका क़ुसूर था

हम खो गये थे ख़ुद ही किसी की तलाश में 
ये हादिसा भी इश्क़ में होना ज़रूर था

गर्दन झुकी तो थी तेरे दीदार के लिये
देखा मगर तो शीशा—ए—दिल चूर—चूर था

बदली जो रुत तो शाम—ओ—सहर खिलखिला उठे
मंज़र वो दिलनवाज़ ख़ुदा का ज़हूर था

उसके बग़ैर कुछ भी दिखाई दे मुझे
कैसे कहूँ वो मेरी निगाहों का नूर था

कल तक तो समझते थे गुनहगार वो मुझे
क्यूँ आज कह रहे हैं कि मैं बेक़ुसूर था

जो मुझको क़त्ल करके सुकूँ से न सो सका
दुश्मन तो था ज़रूर मगर बा—शऊर था

साग़र वो कोसते हैं ज़माने को किसलिए
उनको डुबो गया जो उन्हीं का ग़रूर था.

More Popular Articles


 

Add comment


Security code
Refresh

Astrology - ज्‍योतिष

Marriage life and Astrology - ज्योतिष और वैवाहिक सुख

Marriage life and Astrology - ज्योतिष और वैवाहिक सुख

विवाह समाज द्वारा स्थापित एक प्राचीनतम परम्परा है जिसका उद्देश्य काम -संबंधों को मर्यादित करके सृष्टि की रचना में सहयोग ...
More on Astrology - ज्‍योतिष

Jokes

Husband and Wife in court : divorce

Husband and Wife in court : divorce

Scene: Husband and Wife in court getting a divorce. The problem was who should get custody of the child? ...
More on Jokes

Beauty & Style

Marriage & Relationship