उनको मुहब्बत का शौंक हुआ है
जिनको कुछ पता ही नही वफ़ा के बारे में
जनाज़ा रोक कर मेरा, वो इस अंदाज से बोले,
गली हमने कही थी, तुम तो दुनिया छोड़ जाते हो.
जो दिल माँगा तो वो बोले की ठहरो, याद करने दो
ज़रा सी चीज़ थी हमने खुदा जाने कहाँ रख दी
जी खुश हो गया मस्जिदे-वीराँ को देखकर
मेरी तरह खुदा का भी खाना खराब है
ये मुहब्बत, ये दोस्ती, ये वफफा
सब वसीले हैं दिल दुखाने के
ऐ वादा-ए-विसाल, बता तेरा कया करूँ
उनको तो भूल जाने कि आदत सी हो गई
वादा करके और भी आफत में डाला आपने
जिंदगी तो मुश्किल थी, अब मरना भी मुश्किल हो गया
होता नही है कोई बुरे वक़त में शरीक
पत्ते भी भागते हैं खिज़ाँ में, सजर से दूर
बोहत हुजूम था मस्जिद में मैक़दे कि तरह
मैं लौट आया, शरीके नमाज़ हो ना सका
गुनगुनाती हुई आती हैं फलक से बूँदें
कोई बदली तेरी पाज़ेब से टकराई है
कुछ तो मेरे पिंदारे-मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिये आ
ये कहेंगे, वो कहेंगे, कह्ते थे फ़ुर्क़्त में हम
आ गये जब सामने, सारा गिला जाता रहा
लहरों में डूबते रहे, दरिया नही मिला,
उससे बिछुड़ के फ़िर कोई वैसा नही मिला


















